मन दिल से मिली तो पूछा….

मन दिल से मिली तो पूछा….

मन:   कैसी हो, लंबे समय के बाद मिली हो!
दिल: बहुत अच्छे हैं! और तुम सुनोओ, आज कल क्या करती हो?
मन:   पढ़ाई कर रहें हैं, फिर से स्कूल में भरती हो गये|
दिल: अच्छा! क्या पढ़ रही हो? कैसे चल रही हैं?
मन:   मैं अपने बारे में पढ़ रही हूं| जान रही हूं की मैं कौन हूँ, मेरे क्या गुण है, मेरी क्या शक्तियाँ हैं! बहुत मजेदार पढ़ाई है|
दिल: अरे वाह! सच में बहुत मजेदार पढ़ाई लगती है| इस पढ़ाई से कौन सी डिग्री मिलती है?
मन:   इस पढ़ाई से हम मनुष्य से देवता बनते हैं और स्वर्ग की राज्य मिलती है| तुम भी चलो, भरती हो जाओ| पढ़ाने वाला बड़ा मीठा हैं और विश्व का नंबर वन शिक्षक भी हैं!
दिल: मैं तो यात्रा पर हूँ, इसलिये मैं ना आ सकुंगि|

मन:   अच्छा! कैसी यात्रा? कहाँ जाना हैं?
दिल: अपने मीत से मिलने उनके घर जाना हैं|
मन:   अरे वाह! कौन है यह जिनके लिए तुम यात्रा पर चल पड़ी हो?
दिल: वही जिन्हें हमने जनम जनम से पूजा, वही जिनके सपने हमने दिन रात देखे, वही जिनकी राह देखके आँखें कभी नहीं थकी, वही जो अब तक सिर्फ ख्यालों में थे, वही हैं…
मन:   अरे, तुम्हे तो प्यार हो गया! कहाँ रहते हैं तेरे मीत?
दिल: इस दुनिया से बहुत दूर, चाँद तारों के उस पार, उस अनोखी दुनिया में जहाँ सिर्फ शांति ही शांति है|
मन:   तब तो हम दोनो की मंज़िल बहुत ऊँची है!
दिल: यह तो है! लेकिन अगर सात देने वाला इतना मीठा हो, इतना अच्छा हो तो मंज़िल जैसे सामने खड़ी हैं|
मन:   सच कहा तुमने! बहुत खुशी हुई तुमसे मिलके और बातें करके| जब अपने मीत से मिलो तो मेरा याद प्यार जरूर देना|
दिल: हाँ| मेरी भी आशा हैं की तुम खूब पढ़कर स्वर्ग के राजा बनो| और हाँ, अपने शिक्षक से मिलो तो मेरी नमस्ते जरूर कहना|

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